नई दिल्ली. भारत में बारिश का समय सामान्यतः 15 जून से 15 सितम्बर तक का होता है. इसी मौसम के दौरान परजीवि0यों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि देखने को मिलती है. ऐसे में पशुपालन करने वाले पशुपालकों को 15 जून से लेकर 15 सितंबर तक बहुत ज्यादा अलर्ट रहने की जरूरत होती है. क्योंकि इस दौरान बारिश की वजह से पशुओं को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. पशुओं को कई तरह की बीमारी होने की भी आशंका भी रहती है. इसलिए बेहद ही एहतियात के साथ पशुपालन का काम करना चाहिए.
इस रिपोर्ट में पशुपालकों की मदद के लिए बरसात के मौसम दौरान अपनाने योग्य कुछ महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया गया है. जिसका पालन करने से पशुपालक अपने पशु संसाधन के स्वास्थ्य को बनाए रख सकते हैं. यदि आप भी ऐसा करना चाहते हैं तो इसरिपोर्ट को गौर से पढ़ें.
क्या-क्या काम करना चाहिए
बारिश के पहले पशुओं के पशुशाला की छत की मरम्मत कर दें. जिससे बारिश का पानी न टपके.
पशुशाला की खिड़कियां खुली रखें तथा गर्मी एवं उमस से बचने के लिये पंखों का उपयोग करें.
इस मौसम में साफ-सफाई का खास ख्याल रखें एवं पानी को एक जगह पर एकत्रित नहीं होने दें जिससे मच्छर न हों और परजीवी संक्रमण को रोका जा सके.
पशुशाला में पशु के मल-मूत्र की निकासी का भी उचित प्रबंधन हो. पशुशाला को दिन में एक बार फिनाईल के घोल से अवश्य साफ करें, जिससे बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया कम हो सके.
बाड़े में और उसके आस-पास कचड़ा और गंदगी इकट्ठा न होने दें और उसके निकास की उचित व्यवस्था हो. नियमित अन्तराल पर कीटनाशक का भी छिड़काव करें.
जानवरों को ज्यादा शारीरिक थकावट न होने दें और बार-बार धूप में न लाएं.
बारिश के मौसम में पशुओं को बाहर चरने के लिये नहीं भेजें क्योंकि बारिश के मौसम में गीली घास पर कई तरह के कीड़े होते हैं जो पशुओं के पेट में चले जाते हैं और शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं.
पशु को खेतों के करीब गढ्ढे या तालाब का पानी पिलाने से परहेज करें. क्योंकि इस दौरान किसान खेतों में खर-पतवार एवं कीटनाशक दवा का इस्तेमाल करते हैं जो कि रिसकर इनमें आ जाता है.
कोशिश करें कि पशु को बाल्टी से साफ एवं ताजा पानी पिलाए.ं
दाने का स्टोरेज नमी रहित जगह पर करें और ध्यान दें कि इस मौसम में दाने को 15 दिन से अधिक भण्डारण न करें.










