नई दिल्ली. मध्य प्रदेश में पशुपालन को अब सिर्फ दूध बेचने तक सीमित नहीं रखा जाएगा. राज्य सरकार डेयरी सेक्टर को नए बिजनेस मॉडल में बदलने की तैयारी कर रही है, जहां पशुपालक सिर्फ दूध से नहीं, बल्कि अपनी गाय और भैंस की नरल से भी कमाई कर सकेंगे. इसी दिशा में प्रदेश में “ब्रीड फेडरेशन बनाने की तैयारी शुरू हो गई है. इसके तहत साहिवाल, गिर, धारपारकर और मुर्रा जैसी प्रमुख नस्लों के लिए जिला स्तर पर अलग-अलग एसोसिएशन बनाई जाएंगी. सरकार का उदेश्य इन नस्लों को संगठित पहचान देना, उनकी शुद्धता बनाए रखना और पशुपालकों को सीधा आर्थिक फायदा पहुंचाना है.
योजना के मुताबिक पहले पहले जिला जिला स्तर पर नस्ल आधारित एसेसिएशन बनाई जाएंगी. इसके बाद चुनाव कराकर राज्य स्तनीय कार्यकारिणी गठित की जाएगी. शुरुआती दौर में इन संगठनों का संचालन प्रशासनिक सहयोग से होगा, लेकिन 3 से 5 साल के भीतर इन्हें पूरी तरह स्वायत्त बना दिया जाएगा. बाद में इनका संचालन खुद पशुपालक करेंगे.
देसी नस्लों को मिलेगी नई पहचान
सरकार इन संगठनों को तकनीकी प्ररिक्षण, फडिंग और मार्केटिंग एक्सपर्ट्स की मदद भी उपलब्ध कराएगी, ताकि प्रदेश की देसी नस्लों को नई पहचान मिल सके.
इस मॉडल के लागू होने के बाद पशुपालकों की आय केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं रहेगी.
पशुपालक नस्ल आधारित पशुओं की बिक्री कर अतिरिक्त आय कमा सकेंगे. इसके अलावा दवाइयां और पशुपालन से जुड़े उपकरण थोक में खरीदने से लागत भी कम होगी.
वहीं दूसरी ओर हर गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने और हर किसान, पशुपालक, दुग्ध उत्पादक की आत्मनिर्भर बनाने में डेयरी सेक्टर को मजबूत बनाया जा रहा है.
दूध उत्पादन के जरिए आर्थिक स्वावलंबन को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास हो रहा है.
नेशनल डेयरी डेवलपमेंट योर्ड के साथ मिलकर दूध उत्पादन बढ़ाने की और कदम बढ़ा दिया है.
नई-नई गौशालाएं खोली जा रही है. मात्र 25 गायों की गौशाला खोलने वाले पशुपालक को सरकार 10 लाख रुपाए प्रति यूनिट सब्सिडी दे रही है.
डेयरी उद्यमिता को एक लाभकारी, टिकाऊ और तकनीक से जुड़े रोजगार सृजन मॉडल के रूप में स्थापित करने के लिए हर स्तर पर काम जारी है.
अभी प्रदेश में 9 लाख लीटर प्रतिदिन कलेक्शन 12 लाख लीटर प्रतिदिन हो गया है. दूध कलेक्शन को 50 लाख लीटर प्रतिदिन करने का लक्ष्य लेकर आने बढ़ रही है.
नस्ल सुधार, नौशालाओं को हाइटेक बनाने और स्वावलंवी बनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से प्रयास किए जा रहे हैं. दो साल पहले तक प्रदेश में करीब 1800 गौशालाएं थीं.
गौवंश सहायता राशि 20 रुपए से बढ़ाकर 40 रुपए प्रति गौवंश करने के बाद 1300 नई गौशालाओं का निर्माण हुआ है. इन सभी नौशालाओं में करीव 5 लाख से अधिक गौवंश पालन किया जा रहा है.











