नई दिल्ली. मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में शहर हो या गांव सड़कों पर मवेशियों का जमावड़ा आम बात है. इनमें से ज्यादातर मवेशी पालतू होते हैं, जिन्हें इनके पालक खुला छोड़ देते हैं और कई बेसहारा मवेशी भी सड़कों पर घूमते दाना-पानी की तलाश करते रहते हैं. इनमें बड़ी संख्या में गोवंश होते हैं हालांकि ऐसे मवेशियों को आसरा देने के लिए बहुत कोशिश नहीं करते नजर आते हैं. सेवा भावना का ऐसा ही काम किया है डोंगरगांव पंचायत ने. पंचायत द्वारा गांव में 38 लाख रुपए की लागत से गौशाला बनाई गई है. इसमें 80 निराश्रित गोवंश का पालन किया जा रहा है.
जाानकारी के मुताबिक इन गोवंश के लिए गौशाला में रहने, चारा-पानी और देखभाल के साथ हर तरह की व्यवस्था की गई है. ग्रामीण भी पंचायत के इस प्रयास को सराह रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है पंचायत द्वारा गौशाला बनाने से निराश्रित गोवंश को आश्रय मिला है. वहीं इनके कारण गांव में होने वाली गंदगी से भी निजात मिली है.
सफाई का भी खास ध्यान दिया गया है
सरपंच रेखा बाई नेमीचंद पवार और सचिव प्रवीण कैलाश चांदोड़े ने बताया गौशाला में साफ-सफाई, पानी की नियमित आपूर्ति और छांव की भी पर्याप्त व्यवस्था की गई है.
इससे पशुओं को बेहतर वातावरण मिल रहा है. पंचायत की इस पहल से गांव में घूमने वाले मवेशियों की समस्या से छुटकारा मिला है. इससे ग्रामीणों की बढ़ी परेशानी दूर हुई है.
गांव में नल जल योजना संचालित है. पानी के लिए पंचायत द्वारा ट्यूबवेल लगवाया है. इससे नलों के माध्यम से घर-घर तक पानी पहुंच रहा है.
इससे ग्रामीणों की पानी की समस्या दूर हुई है. पंचायत द्वारा गांव में स्वच्छता पर खास ध्यान दिया जा रहा है.
नियमित सफाई कराई जा रही है. पंचायत ने मुक्तिधाम को भी नए सिर से संवारा है. बारिश सहित निस्तार के पानी की निकासी के लिए नालियां बनाई गई हैं.
कीचड़ से निजात दिलाने और लोगों की आवाजाही आसान करने के लिए लाखों रुपए की लागत से सीसी रोड बनाए गए हैं.
पंचायत के बारे में जानें
डोगर गांव में 38 लाख की लागत से गोशाला बनाई गई है.
इस पंचायत की जनसंख्या 5 हजार है.
यहां की साक्षरता दर की बात की जाए तो 80 फीसद है.
जिला मुख्यालय से दूरी 18 किमी है.
कनेक्टिविटी की बात की जाए तो जलगांव-जामोद रोड से जुड़ा गांव तक है.
इस पंचायत आय का मुख्य श्रोत खेती—बाड़ी है.
निष्कर्ष
कई राज्यों में सरकारें बेसहारा पशुओं को सहारा देने के लिए पशुशाला खोल रही हैं. हालांकि आम इंसानों और पंचायत स्तर पर भी इस तरह की पहल मिले तो बेसहारा पशुओं की समस्या खत्म हो सकती है.











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