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Poultry Farming: अंडा देने वाली देसी नस्ल की आठ मुर्गियां हैं बेहद खास, बिजनेस से कर देंगी मालामाल

bird flu
प्रतीकात्मक फोटो.

नई दिल्ली. कौन कारोबारी नहीं चाहेगा कि वो सबसे ज्यादा अंडे देने वाली मुर्गी का पालन करे. हालांकि इससे पहले कुछ बातें का जानना भी जरूरी है. मुर्गी पालक ये जान लें कि मुर्गी किसी भी नस्ल की हो लेकिन रोज अंडा नहीं दे सकती है. पोल्ट्री एक्सपर्ट का कहना है कि ये सौ फीसदी सच है कि मुर्गी चाहे किसी भी नस्ल की हो, या फिर वो उन्हें दवाएं देकर या या फीड की हाई डोज देकर अंडे प्राप्त कर सकें तो ऐसा नहीं हो सकता. कृषि लेयर बर्ड मुर्गी साल में 280 से 290 ही अंडा देती हैं. गौरतलब है कि अंडे की तरफ लोगों को जागरुक करने और अंडे की खपत बढ़ाने के मकसद से ‘संडे हो या मंडे, रोज खाएं अंडे’ का नारे वाला विज्ञापन रोजाना टीवी पर दिखाया जाता है. नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (एनईसीसी) इस एड को चलवाती है. वहीं पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया के एक आंकड़े के मुताबिक देश में 28 करोड़ मुर्गियां अंडे की डिमांड को पूरा करती हैं.

अंडा देने वाली देसी नस्ल की आठ मुर्गियां

लेयर बर्ड या कृषि लेयर बर्ड भी कहा जाता है. इसका एक दिन का (चूजा) 40 से 45 रुपये का मिलता है. 4.5 से 5 महीने की उम्र पर यह अंडा देना शुरू कर देती है. 19 से 20 महीने तक ये मुर्गी 90 फीसदी तक अंडा दे देती है. वहीं 20 महीने बाद मुर्गी को मोल्टिंग पर लगाकर दोबारा अंडा उत्पादन शुरू किया जाता है. अंडा देने वाली मुर्गी रोजाना 125 से 130 ग्राम तक दाना खाती है. शुरुआत में मुर्गी 25 ग्राम का अंडा देती है. सबसे सस्ता 6 से 7 रुपये का इसी मुर्गी का अंडा बिकता है. इस मुर्गी के अंडे से चूजा नहीं निकलता है. यह मुर्गी सालाना 315 मिलियन अंडे की पूर्ति करने में समक्ष है.

ये हैं नस्लेंः लेअर बर्ड के अलावा और अंडे देने वाली जो मुर्गियों की नस्ल हैं. उन्हें देसी मुर्गी भी कहते हैं. देसी मुर्गियों की 8 ऐसी नस्ल हैं जो अंडे देने का काम करती है. जैसे वनश्री एक साल में 180 से 190 तक अंडे दे देत है. ग्रामप्रिया 160 से 180, निकोबरी 160 से 180, कड़कनाथ 150 से 170, सरहिंदी 140 से 150, घागुस 100 से 115, वनराजा 100 से 110 अंडे का उत्पादन करती है. असील मुर्गियों की एक ऐसी नस्ल है जो सालभर में 60 से 70 अंडे देती है.

सौ रुपये तक बिकता है अंडाः देशी मुर्गे-मुर्गी में असील एक खास नस्ल मानी जाती है. हालांकि देशी में कड़कनाथ, वनश्री, निकोबरी, वनराजा, घागुस और श्रीहिंदी भी है. असील इसलिए भी खास है कि ये बैकयार्ड पोल्ट्री के तहत यह पाली जाती है. इसका मीट बहुत कम खाया जाता है. लेकिन अंडे की डिमांड बहुत रहती है. सर्दियों में इसका अंडा 100 रुपये तक का बिकता है. क्योंकि असील का अंडा दवा के तौर पर खाया जाता है. बाकी डिमांड के हिसाब से मुर्गी वाला जो मांग लें.जबकि हैचरी के लिए सरकारी केन्द्रों से ही असील मुर्गी का अंडा 50 रुपये तक का बिकता है.

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