नई दिल्ली. मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए कई तरह से काम किया जाता है. सरकार फिशरीज सेक्टर को मजबूत करने के लिए रिवर रैचिंग प्रोग्राम भी चलाती है. रिवर रैंचिंग का मतलब नदी तटीय पालन है. ये एक वैज्ञानिक और सस्टेनेबल मत्स्य पालन पहल है. इसके तहत देशी प्रजाति की मछलियों को हैचरी में पालकर और उचित आकार (10-15 सेमी) तक बड़ा करने के बाद प्राकृतिक नदियों में छोड़ा जाता है. जिसका फायदा मछली पकड़कर आजिविका चलाने वालों को होता है. इसका मुख्य उद्देश्य जल की गुणवत्ता सुधारना, मछली उत्पादन बढ़ाना और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखना है.
पिछले दिनों मथुरा के कॉलेज ऑफ फिशरीज साइंस ने ‘राष्ट्रीय किसान दिवस’ के जश्न के हिस्से के तौर पर यमुना नदी में एक रिवर रैंचिंग प्रोग्राम का सफलतापूर्वक आयोजन किया.
मछली की आबादी बढ़ाना है इसका मकसद
इस पहल का मकसद मछली की आबादी बढ़ाना, जलीय जैव-विविधता को बचाना और प्राकृतिक जल स्रोतों में टिकाऊ मछली पालन प्रबंधन को बढ़ावा देना था.
इस प्रोग्राम को नेशनल फ़िशरीज़ डेवलपमेंट बोर्ड (NFDB) हैदराबाद ने फंड किया था.
प्रोग्राम के दौरान, गोकुल घाट पर यमुना नदी में इंडियन मेजर कार्प प्रजाति की लगभग 15,000 फ़िंगरलिंग्स (छोटी मछलियाँ) छोड़ी गईं.
उम्मीद है कि इस रैंचिंग गतिविधि से स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदायों के लिए आजीविका के मौकों को मजबूत करने, पारिस्थितिक संतुलन को बेहतर बनाने और देशी मछली की आबादी को बहाल करने में मदद मिलेगी.
इस प्रोग्राम में मुख्य अतिथि के तौर पर ब्रज तीर्थ विकास परिषद, मथुरा के उपाध्यक्ष श्री शैलजाकांत मिश्रा और DUVASU, मथुरा के माननीय कुलपति डॉ. अभिजीत मित्रा शामिल हुए.
इनके साथ ज़िला वन अधिकारी, अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट और मथुरा के सहायक निदेशक (मत्स्य पालन) समेत जिले के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे.
इस मौके पर कॉलेज ऑफ फिशरीज साइंस के डीन डॉ. नित्यानंद पांडे के साथ फ़ैकल्टी, स्टाफ़ सदस्य और छात्र भी मौजूद थे.
सभा को संबोधित करते हुए, मुख्य अतिथि श्री शैलजाकांत मिश्रा ने यूनिवर्सिटी की इस पहल की तारीफ की और यमुना नदी के सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व पर जोर दिया.
उन्होंने कहा कि ऐसे रिवर रैंचिंग प्रोग्राम जलीय जैव-विविधता को बहाल करने और स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदायों की आजीविका को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं.
माननीय कुलपति डॉ. अभिजीत मित्रा ने ज़ोर दिया कि रिवर रैंचिंग, घटती मछली की आबादी को बहाल करने और नदी प्रणालियों में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने का वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तरीका है.
उन्होंने मछुआरों की आजीविका बढ़ाने के साथ-साथ संरक्षण के प्रयासों को जोड़ने के महत्व पर ज़ोर दिया और सभी संबंधित लोगों से टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल मछली पालन के तरीकों को अपनाने का आग्रह किया.
उन्होंने लंबे समय तक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की लगातार निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन की जरूरत पर भी ज़ोर दिया.










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