नई दिल्ली. अन्य पशुओं की तरह ही बकरियों को भी खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) रोग परेशान करता है. ये बकरियों को भी होता है और उनके उत्पादन को प्रभावित करता है. यहां तक तो मामला ठीक है लेकिन इस बीमारी में बकरियों की 100 फीसद तक मौत भी हो जाती है. ये मामला ज्यादा गंभीर है. इसलिए इससे बचाव करना बेहद ही जरूरी होता है. भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) के एक्सपर्ट का लाइव स्टक एनिमल न्यूज (Livestock Animal News) को बताया कि बकरियों को इस बीमारी से बचाना के लिए वैक्सीन लगवाई जाती है.
अगर आप भी इस बीमारी की डिटेल जानना चाहते हैं और ये कि कैसे क्या इस बीमारी के लक्षण हैं और कैसे रोकथाम करते हैं तो इस खबर को आखिरी तक पढ़ें
बीमारी की फुट डिटेल क्या है
यह विषाणु जनित रोग है. ये बीमाारी ओए एशिया-1 द्वारा होती है. बूढ़े पशु में इस रोग के मुख्य लक्षण, मुंह जीभ, डेन्टल पैड व खुरों के बीच में छाले व फूटकर घाव हो जाना है.
जिसके कारण पशु लंगड़ाने लगता है तथा मुंह में छाले व घाव हो जाने के कारण चारा खाने में परेशानी होती है.
नवजात मेमनों में बिना किसी लक्षण के अचानक मृत्यु हो जाती है. मेमनों में यह रोग हृदय को प्रभावित करता है जिससे मृत्युदर 80-100 प्रतिशत तक हो जाती है. इस रोग का कोई विशेष उपचार नहीं है
बीमारी में सही देखभाल जिसके तहत लक्षणों के आधार पर उपचार एन्टीबायोटिक, दर्द, बुखार रोकने की दवाएं (एनाल्जेसिक) तथा मुंह के व खुरों के छाले इत्यादि की एन्टीसेप्टिक घोल से धुलाई की जानी चाहिए.
नर्म व सुपाच्य भोजन की आपूर्ति व रोगी प्रभावित पशुओं को एक जगह रखना इत्यादि किया जा सकता है.
इस रोग के प्रभावी रोकथाम के लिये खुरपका मुंहपका की पालीवैलेन्ट वैक्सीन द्वारा टीकाकरण ही उचित उपाय है.
इसका टीका प्रतिवर्ष 6 महीने के अन्तराल पर मुख्यरूप से जनवरी-फरवरी व जुलाई-अगस्त में 1 मिली खाल के नीचे मांस में लगाते हैं.
मेमनों में टीका 3 माह से अधिक उम्र के बच्चों में लगाना चाहिए.












