नई दिल्ली. मौसम में बदलाव के साथ मर्गी पालन में कई तरह की दिक्कते आने लग जाती हैं. इतना ही नहीं मुर्गियों के फीड पर भी इसका असर दिखाई देता है. असल में ये मक्का और सोयाबीन जैसे चारे की उपलब्धता और लागत को प्रभावित करता है, जिससे मुर्गीपालन कार्यों की आर्थिक खतरा बढ़ जाता है. राजस्थान के पशुपालन विभाग (Department of Animal Husbandry, Rajasthan) की मानें तो मुर्गी पालन में इन परेशानियों के समाधान के लिए जलवायु-स्मार्ट पोल्ट्री की अवधारणा तीन मुख्य उद्देश्यों के इर्द-गिर्द घूमती है. जिससे खतरे को कम किया जा सकता है.
मुर्गीपालन की उत्पादकता और आय में स्थायी ग्रोथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अनुकूल और लचीलापन विकसित करना जरूरी और जहां तक संभव हो, इस क्षेत्र से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना चाहिए.
कौन सी नस्ल को पालें
ये लक्ष्य जलवायु-स्मार्ट कृषि के मेथड के साथ निकटता से जुड़े हैं और मुर्गी पालन, आवास, आहार और प्रबंधन के तरीके में व्यवस्थित बदलाव की जरूरत है.
जलवायु-स्मार्ट पोल्ट्री के महत्वपूर्ण घटकों में से एक आनुवंशिक रूप से लचीली पक्षी नस्लों का चयन और विकास है.
कड़कनाथ, वनराज, ग्रामप्रिया और असील जैसी देशी नस्लों ने चरम जलवायु के प्रति बेहतर प्रदर्शन करती नजर आती हैं.
ये मुर्गियां रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और गर्मी के प्रति सहनशीलता दिखाती हैं. ये पक्षी कम इनपुट वाले पिछवाड़े प्रणालियों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं.
एक्सपर्ट के मुताबिक ये व्यावसायिक नस्लों के लिए एक विकल्प प्रदान करते हैं जो अक्सर पर्यावरणीय तनाव के प्रति संवेदनशील होते हैं.
आनुवंशिक अनुसंधान और प्रजनन तकनीकों में प्रगति, आहार दक्षता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और ताप सहनशीलता जैसे गुणों को और बढ़ा सकती है.
निष्कर्ष
एक्सपर्ट का कहना है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में मुर्गी पालन अधिक लचीला और उत्पादक बन सकता है.












