Home डेयरी NDDB: LPG की कमी को पूरा कर सकता है NDDB का ये मॉडल, डेयरी किसानों की भी बढ़ेगी इनकम
डेयरी

NDDB: LPG की कमी को पूरा कर सकता है NDDB का ये मॉडल, डेयरी किसानों की भी बढ़ेगी इनकम

एनडीडीबी का जकरियापुरा मॉडल.

नई दिल्ली. ऐसे समय जब देश में एलपीजी की किल्लत है तो राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड NDDB द्वारा विकसित ‘जकरियापुरा मॉडल’ (Zakariyapura Model), इसकी भरपाई करने का एक अच्छा जरिया बन सकता है. असल में ये मॉडल खाद प्रबंधन की एक विकेंद्रीकृत पहल है जिसे छोटे पैमाने पर डेयरी का काम करने वाले किसानों के लिए डिजाइन किया गया है. गुजरात के आनंद जिले में शुरू किया गया यह मॉडल, परिवारों को 2 m³ क्षमता वाले ‘फ्लेक्सी बायोगैस प्लांट’ लगाने में मदद करता है. इन प्लांट में रोजाना 40–50 किलोग्राम पशुओं के गोबर का इस्तेमाल करके, हर महीने 1.5–2 LPG सिलेंडरों के बराबर स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन तैयार किया जाता है, जिससे बाजार से मिलने वाली LPG पर निर्भरता कम होती है.

इस प्रक्रिया से जो ‘बायो-स्लरी’ (तरल खाद) निकलता है, उसे या तो सीधे खेतों में इस्तेमाल किया जाता है, या फिर ‘मुजकुवा सखी खाद सहकारी मंडली’ और ‘जकरियापुरा सखी खाद सहकारी मंडली’ जैसी महिलाओं द्वारा संचालित खाद सहकारी बोझ को बेच दिया जाता है.

ऐसे काम करता है ये मॉडल
ये सहकारी समितियां इस स्लरी को इकट्ठा करती हैं, उसकी जांच करती हैं, और फिर उसे ‘सुधन’ ब्रांड के तहत तरल जैविक खाद में बदल देती हैं.

गौरतलब है कि पूरे देश में 79 हजार से ज्यादा घरों में ऐसे प्लांट लगाए जा चुके हैं. यह मॉडल जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में भी अहम भूमिका निभाता है.

इसका हर एक प्लांट हर साल लगभग 7.3 tCO₂e (कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्य) को कम करता है.

LPG की सप्लाई में होने वाले उतार-चढ़ाव से परिवारों को सुरक्षित रखे हुए, और गोबर को ऊर्जा, खाद और आमदनी के स्रोत में बदलाव के लिए ये मॉडल अच्छा है.

‘जकरियापुरा मॉडल’ ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका को टिकाऊ बनाने का एक ऐसा ‘आत्मनिर्भर’ और बड़े पैमाने पर लागू किया जाने वाला तरीका पेश करता है.

गोबर का जब वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाता है, तो यह ग्रामीण परिवारों के लिए एक मूल्यवान संसाधन बन जाता है.

NDDB द्वारा बढ़ावा दिए गए बायोगैस सिस्टम के माध्यम से, गोबर को खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन में बदला जाता है.

जिससे LPG पर निर्भरता कम होती है, धुएं से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम घटते हैं, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आती है.

निष्कर्ष
चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिए जैविक खाद का उत्पादन होता है और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का सृजन होता है. जिसका पूरी तरह से फायदा डेयरी किसानों को मिलता है.

Written by
Livestock Animal News Team

Livestock Animal News is India’s premier livestock awareness portal dedicated to reliable and timely information.Every news article is thoroughly verified and curated by highly experienced authors and industry experts.

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

कंकरेज नस्ल के मवेशी तथा जाफराबादी, नीली रावी, पंढरपुरी और बन्नी नस्ल की भैंसों को शामिल किया गया है. इसमें रोग मुक्त हाई जेनेटिक वाले सांडों को पंजाब सहित देश भर के वीर्य केंद्रों को उपलब्ध कराया जाता है.
डेयरी

Milk: एमपी में बढ़ गया दूध उत्पादन, मिल्क कैपिटल बनने की राह पर है राज्य

नई दिल्ली. मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार...

डेयरी

DDGS है डेयरी पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बेहतरीन विकल्प

नई दिल्ली. डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (DDGS) इथेनॉल उत्पादन यानि मक्का...

livestock animal news
डेयरी

Dairy: एमपी में बनेंगे आदर्श पशु ग्राम, सधरेगी पशु नस्ल, बढ़ेगा दूध उत्पादन

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम की तरह प्रदेश में आदर्श पशु ग्राम...