नई दिल्ली. वैश्विक कृषि और खाद्य सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण घटक, पोल्ट्री उद्योग, अब जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के कारण गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है. पोल्ट्री एक्सपर्ट कहते हैं कि बढ़ता तापमान, गैर नियमित बारिश और लगातार गर्म मौसम की घटनाएं पोल्ट्री बर्ड के स्वास्थ्य, चारे की उपलब्धता, जल संसाधनों और समग्र उत्पादकता को सीधे प्रभावित कर रही है. ये जलवायु संबंधी तनाव न केवल पोल्ट्री पालन की स्थिरता के लिए खतरा है, बल्कि उत्पादन लागत और छोटे किसानों की असुरक्षा को भी बढ़ाते हैं.
इस बदलते परिदृश्य में, “जलवायु-स्मार्ट पोल्ट्री” की ओर इशारा करता है. ताकि स्थायी पोल्ट्री उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके जो पर्यावरणीय प्रभाव को कम करते हुए जलवायु झटकों का सामना कर सके.
यहां पढ़ें क्या आती हैं दिक्कतें
जलवायु परिवर्तन पोल्ट्री पालन को कई तरह से प्रभावित करता है. सबसे गंभीर समस्याओं में से एक टेंप्रेचर का तनाव है.
ये ब्रॉयलर और लेयर पक्षियों को गंभीर रूप से प्रभावित करता है. हाई टेंप्रेचर के कारण चारे के सेवन को कम करता है, वजन बढ़ने को धीमा करता है.
अंडे के उत्पादन को कम करता है और मृत्यु दर को बढ़ाता है.
इसके अलावा, गर्म और आर्द्र परिस्थितियों से रोग पैदा करने वाले रोगाणुओं का प्रसार होता है.
जिससे न्यूकैसल रोग, एवियन इन्फ्लूएंजा और परजीवी संक्रमण जैसे प्रकोपों का खतरा बढ़ जाता है.
जलवायु परिवर्तन शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जल की कमी को भी बढ़ाता है, जिसका सीधा असर पक्षियों के स्वास्थ्य और स्वच्छता पर पड़ता है.
इसके अलावा, जलवायु परिवर्तनशीलता के कारण फसल चक्र में व्यवधान मक्का और सोयाबीन जैसे चारे की उपलब्धता और लागत को प्रभावित करता है, जिससे मुर्गीपालन कार्यों की आर्थिक व्यवहार्यता को खतरा होता है.












