नई दिल्ली. हाल ही में भारत सरकार के मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने आईसीएआर-केंद्रीय भेड़ ऊन अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीएसडब्ल्यूआरआई) के सहयोग से राजस्थान के अविकानगर में भेड़ों पर संगोष्ठी का आयोजन किया. जहां सीएसडब्लूआरआई के डॉयरेक्टर डॉ. अरुण कुमार तोमर ने देश में भेड़, मटन और ऊन क्षेत्र की स्थिति के बारे में अहम जानकारी साझा की. साथ ही बताया कि कैसे भेड़ों के पालन को बढ़ावा देने का काम किया जा रहा है. इस दौरान पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) के संयुक्त सचिव डॉ. मुथुकुमारसामी बी ने राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम) के तहत भेड़ों के सुधार कार्यक्रम में चर्चा की.
उन्होंने कहा कि विभाग राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम) के तहत भेड़ नस्ल सुधार कार्यक्रमों पर विशेष जोर दे रहा है. राष्ट्रीय श्रम मंत्रालय (एनएलएम) के उद्यमिता विकास कार्यक्रम (ईडीपी) के तहत 500 भेड़ व बकरियों की क्षमता वाली परियोजनाओं के लिए 50 फीसद तक (अधिकतम 50 लाख रुपये) की पूंजी सब्सिडी प्रदान की जा रही है. इस योजना को लेकर लोगों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है.
भेड़ का मांस और ऊन की उत्पादकता बढ़ाने पर जोर
उन्होंने आगे कहा कि पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (एएचआईडीएफ) के तहत डीएएचडी वेस्ट से पैसा कमाने की पहल पर काम हो रहा है.
वैक्सीन उत्पादन इकाइयों और प्राथमिक ऊन प्रोसेसिंग यूनिट जैसी गतिविधियों के लिए 3 फीसद ब्याज सब्सिडी प्रदान की जा रही है.
क्षमता निर्माण और कौशल विकास की जरूरत पर बोलते हुए कहा कि किसानों और उद्यमियों की ट्रेनिंग में निजी क्षेत्र की भागीदारी के महत्व है.
उन्होंने सरकार की आनुवंशिक सुधार पहलों पर प्रकाश डाला और मोबाइल पशु चिकित्सा वैन के माध्यम से ग्रामीण परिवारों तक कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं की पहुंच की आवश्यकता पर जोर दिया.
भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) के सचिव नरेश पाल गंगवार ने भेड़ और बकरी क्षेत्र की अप्रयुक्त क्षमता पर जोर दिया.
उन्होंने कहा कि भेड़ और बकरियों को अक्सर ‘गरीबों का एटीएम’ कहा जाता है, जो ग्रामीण आजीविका में उनके महत्व को रेखांकित करता है.
उन्होंने रिसर्च आधारित उपायों के माध्यम से इस क्षेत्र को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि शोध के परिणाम सीधे किसानों तक पहुंचे.
उन्होंने डेयरी क्षेत्र की तरह ही भेड़ पालन क्षेत्र में भी एकीकृत मूल्य शृंखला विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया.
रोग नियंत्रण के संबंध में उन्होंने कहा कि राज्यों को पशु चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करना चाहिए, और भारत सरकार को पीपीआर टीकाकरण कार्यक्रमों के माध्यम से उनका सहयोग करना चाहिए.
उच्च निर्यात क्षमता और बढ़ती घरेलू मांग-आपूर्ति के अंतर को देखते हुए महत्वपूर्ण है. कृत्रिम विकल्पों के कारण ऊन की घटती मांग को देखते हुए उन्होंने मांस और ऊन की उत्पादकता बढ़ाने और उच्च प्रदर्शन वाली नस्लों को विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया.












