नई दिल्ली. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, जो दुनिया भर में मछली उत्पादन के मामले में करीब आठ फीसद का योगदान देता है. जिसकी बदौलत देश में ये सेक्टर लाखों परिवारों के लिए, विशेष रूप से तटीय और ग्रामीण क्षेत्रों में, भोजन, रोजगार और आय का एक प्रमुख सोर्स बना हुआ है. लोगों की आजीविका इसपर टिकी हुई है. आंकड़े कहते हैं कि पिछले एक दशक में इसके पैमाने और विधि, दोनों में बड़े बदलाव आए हैं. 2013-14 से 2024-25 तक, देश के कुल मछली उत्पादन में समुद्री और अंतर्देशीय दोनों क्षेत्रों में 104 फीसद की शानदार ग्रोथ हुई है.
आंकड़े कहते हैं कि उत्पादन 96 लाख टन से बढ़कर 195 लाख टन हो गया है. इस ग्रोथ का एक बड़ा हिस्सा आइलैंड मछली पालन से आया है, जिसमें इसी वक्त में 142 फीसद की वृद्धि हुई है. इस सेक्टर में उत्पादन 61 लाख टन से बढ़कर 147.37 लाख टन हो गया ह.
इस सेक्टर से जुड़ी मुख्य बातें क्या हैं
मछली उत्पादन 2013-14 के 96 लाख टन से 104 फीसद बढ़कर 2024-25 में 195 लाख टन हो गया है.
इसी अवधि में आईलैंड फिश फार्मिंग में भी 142 फीसद की वृद्धि हुई है, जो 61 लाख टन से बढ़कर 147.37 लाख टन हो गया है.
22 जुलाई 2025 तक, विभाग ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत 21,274.16 करोड़ रुपए मूल्य की मत्स्य विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी है.
अप्रैल 2025 तक, जल्दी काम के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) के तहत 11.84 करोड़ रुपए पहले ही स्वीकृत किए जा चुके हैं.
अगस्त 2025 तक, मछुआरों, सूक्ष्म उद्यमों, मत्स्यपालक उत्पादक संगठनों और निजी कंपनियों सहित कुल 26 लाख से अधिक हितधारकों ने राष्ट्रीय मत्स्यपालन डिजिटल प्लेटफॉर्म (एनएफडीपी) पर पंजीकरण कराया है.
29 जुलाई 2025 तक, मत्स्यपालन विभाग ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत 17,210.46 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय के साथ बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की मदद की है.
जून 2025 तक, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मछुआरों और मछली पालकों को 4.76 लाख केसीसी जारी किए गए हैं, जिनका कुल वितरण 3 हजार 214.32 करोड़ रुपए है.












