नई दिल्ली. हरियाणा में ठंड की वजह से जहां आम लोगों के रोजमर्रा के काम बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. वहीं पशुओं पर भी ठंड का असर साफ दिख रहा है. ठंड की वजह से पशुओं के दूध उत्पादन की क्षमता पर बेहद ही खराब असर पड़ा है. पशु पहले के मुकाबले कम दूध का उत्पादन कर रहे हैं. वहीं पशुओं के बीमार होने की संख्या बढ़ रही है. पशुपालकों के पशुओं के बीमार होने की खबरें सामने आ रही हैं. जिससे पशुओं में दूध देने की क्षमता भी 20 से 30 फीसदी तक घट गई है. इससे पशुपालकों को नुकसान हुआ है.
हरियाणा महेंद्रगढ़ जिले के नांगल चौधरी-निजामपुर ब्लॉक ठंड की वजह से पहले से ही डार्क जोन में शामिल है. वहीं यहां ग्रामीणों की इनकम का मुख्य साधन पशुपालन लेकिन मौसम की मार के चलते यही व्यवसाय अब संकट में नजर आ रहा है. भीषण ठंड और शीतलहर के कारण मवेशियों के दूध उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. पिछले एक सप्ताह से भी ज्यादा समय से गांवों में शीतलहर और पाला पड़ने की वजह से दूध उत्पादन पर असर पड़ा है.
ठंड से सबसे ज्यादा बछड़े प्रभावित
ठंड बढ़ने से पशुओं की भूख कम हो गई है, जिससे दूध उत्पादन प्रभावित हो रहा है. सबसे ज्यादा असर छोटे कटड़ों और बछड़ों पर पड़ रहा है.
निमोनिया जैसी गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ गया है. कई गांवों से खांसी, सांस लेने में दिक्कत, सुस्ती और बुखार जैसे लक्षणों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.
पशुपालन विभाग ने कहा कि छोटे कटड़ों और बछड़ों को ठंड से बचाने के लिए उन्हें सूखे और गर्म स्थान पर रखा जाए.
रात के समय बिछावन में सूखी पुआल या बोरी का उपयोग जरूर से करें और पशुओं को खुले में बांधने से बचें. पशुओं को पर्याप्त पोषक आहार देने के साथ गुनगुना पानी पिलाने की सलाह दी गई है.
विभाग ने यह भी कहा है कि यदि किसी पशु में निमोनिया या अन्य बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो नजदीकी पशु चिकित्सालय से संपर्क करें और स्वयं दवा देने से बचें.
पशुपालन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बीमार पशु को अलग रखना और तुरंत उपचार करना बेहद ही जरूरी है.
पशु चिकित्सक डॉ. विनय कुमार ने बताया कि सर्दी के मौसम में बाड़े में अलाव जलाना फायदेमंद रहता है तथा पशुओं को हरा चारा खिलाया जाना चाहिए.
मवेशियों को केवल धूप निकलने पर ही नहलाएं और रात के समय पानी पिलाने से परहेज करें. उन्होंने यह भी बताया कि सर्दी बढ़ते ही छोटे कटड़ों के बीमार होने की शिकायतों में तेजी आई है. ऐसे में सतर्कता और समय पर देखभाल ही पशुपालकों के लिए सबसे बड़ा सहारा है.












