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Dairy Animal News: मिल्क फीवर होने पर घट जाता है दूध उत्पादन, पशु की हो सकती है मौत

कंकरेज नस्ल के मवेशी तथा जाफराबादी, नीली रावी, पंढरपुरी और बन्नी नस्ल की भैंसों को शामिल किया गया है. इसमें रोग मुक्त हाई जेनेटिक वाले सांडों को पंजाब सहित देश भर के वीर्य केंद्रों को उपलब्ध कराया जाता है.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. मिल्क फीवर यानी दुग्ध ज्वर डेयरी फार्मिंग में नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी है. यह एक बेहद ही गंभीर चयापचे बीमारी मानी जाती है, जो आमतौर पर बयाने के 24 से 72 घंटे के अंदर कैल्शियम की कमी की वजह से पशु को होती है. अगर पशु को ये बीमारी हो गई तो इससे पशु की उत्पादकता पर भारी असर पड़ता है. यानी उत्पादन क्षमता कम हो जाती है. दूध उत्पादन में गिरावट दर्ज की जाती है. जिसका सीधा सा मतलब है कि इससे डेयरी फार्मिंग में बड़ा और आर्थिक नुकसान होता है.

डेयरी एक्सपर्ट का कहना है कि इस बीमारी के हो जाने पर ज्यादा खर्च भी करना पड़ता है. क्योंकि पशु का इलाज कराने का सीधा सा मतलब है कि इससे डेयरी फार्मिंग की लागत बढ़ जाती है. वहीं गंभीर मामले में पशु की मौत भी हो सकती है. इसलिए इससे बचाव करना बेहद जरूरी है. एक्सपर्ट का कहना है कि ब्याने के 1-3 दिन अंदर दिक्कत हो तो नजरअंदाज न करें.

दुग्ध जवर क्या है, जानें यहां
दुग्ध ज्वर को मिल्क फीवर कहते हैं. यह बीमारी ज्यादातर ब्याने यानि बछड़ा देने के 1-3 दिन के अंदर होती है.

ये बीमारी आमतौर पर पशु को कैल्शियम की कमी की वजह से होती है. इसलिए गर्भ धारण करने वाले पशु को कैल्शियम की कमी नहीं होने देना चाहिए.

दुग्ध जवर की शुरुआती पहचान की बात की जाए तो इसमें पशु सुरत रहता है. उसे भूख बहुत कम लगती है.

जबकि पशु के कान भी ठंडे रहते हैं. पशु को ठंड लगती है और उसका शरीर कांपता है. पशु उठने में कमजोरी महसूस करता है.

गंमीर लक्षणों की बात की जाए तो पशु बैठ या उठ नहीं पाता है. वो गर्दन घुमाए हुए लेटा रहता है.

इसकी एक ये भी पहचान है कि पशु जुगाली बंद कर देता है. अगर इस तरह के लक्षण दिखते हैं मामला बहुत गंभीर हो जाता है.

ध्यान दें कि ससप पर इलाज न मिले वो 24 घंटे में हातत और गंभीर हो सकती है. इससे पशु की जान भी जा सकती है.

तुनंत क्या करें जानें यहां
पशु को सूखी, मुलायम जगह पर लिटाना चाहिए. कोशिश करें कि पशु को ठंड न लगे. यानि ठंड से बचाएं.

तुरंत पशु चिकित्पक बुलाएं ताकि कैल्शियम की भरपाई की जा सके.

बचाव ऐसे कर सकते हैं
ब्याने से 2-3 घंटे पहले संतुलित आहार पशु को देना चाहिए. इससे इसका खतरा कम रहता है.

मिनरल​ मिक्सचर पशु को नियमित रूप से देना चाहिए. पशु चिकित्सक की सलाह पर कैल्शियम दे सकते हैं.

निष्कर्ष
पशुपालन में पशुओं का ख्याल रखना होता है. नहीं तो उत्पादन में असर पड़ता है और इससे डेयरी फार्मिंग में नुकसान होता है.

Written by
Livestock Animal News Team

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