नई दिल्ली. पशुओं में खुरपका मुंहपका रोग यानी एफएमडी एक बेहद ही संक्रामक वायरल बीमारी है. इस बीमारी की वजह से पशु का दूध उत्पादन तकरीबन 80 फीसद तक कम हो सकता है. वहीं बीमारी के चलते पशु कमजोर हो जाते हैं. गर्भपात और बच्चों की मौत का कारण भी ये बीमारी बनती है. ऐसे में सही समय पर वैक्सीन लगा देने से पशुओं को इस जानलेवा बीमारी से बचाया जा सकता है. यही वजह है कि बहुत से पशुपालक इस बात को जानना चाहते हैं कि पशुओं को एफएमडी की वैक्सीन कब लगवानी चाहिए. इस रिपोर्ट में हम आपको इसी के बारे में डिटेल से जानकारी देने जा रहे हैं तो आईए जानते हैं.
आपकी जानकारी के लिए बता देे कि एफएमडी की बीमारी बेहद ही खतरनाक बीमारी है और यही वजह है कि सरकार इस पर काबू पाने के लिए अपने स्तर से प्रयास कर रही है. सरकार की तरफ से पूरी तरह से इसका खत्मा किए जाने का प्रयास जारी है. ताकि दूध उत्पादन में कमी ना आए और देश में तमाम पशु स्वस्थ रहें. इसी वजह से सरकार मुफ्त में एफएमडी की वैक्सीन लगवाती है.
कब लगवाना चाहिए, किस महीने में
एक्सपर्ट का कहना है कि एफएमडी की वैक्सीन साल में दो बार जरूर लगवाना चाहिए. यानी हर 6 महीने पर पशु को एफएमडी का टीका लगाना जरूरी है.
अच्छी बात ये है कि आप खुद समय तय करके किसी भी पशु चिकित्सालय पर जाकर एफएमडी का टीका लगवा सकते हैं. क्योंकि हर जगह यह मुफ्त लगाया जाता है.
हालांकि बहुत से पशुपालक बाजार से एफएमडी का टीका खरीद कर लगवाते हैं. अगर वह ऐसा भी करते हैं तो भी कोई हर्ज नहीं है लेकिन टीका लगवाना ही चाहिए.
अगर समय की बात की जाए तो जब भी बारिश का महीना आने वाला होता है उस समय खास तौर पर एफएमडी का टीका लगवाना चाहिए.
एक्सपर्ट कहते हैं कि जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर तक आप पशुओं को एफएमडी का टीका लगवा सकते हैं.
क्योंकि अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर और जनवरी में सबसे ज्यादा ये बीमारी पशुओं को प्रभावित करती है. जब पहले से वैक्सीन लगी रहेगी तो नुकसान नहीं होगा.
इस बात को गांठ बनाकर रख लें कि बीमारी आने के बाद वैक्सीन लगाने का कोई फायदा नहीं है. पशुओं को पहले ही वैक्सीन लगानी चाहिए. तभी बीमारी से बचाव होगा.
एक्सपर्ट कहते हैं कि वैक्सीन जब भी लगाई जाती है, उसके असर में तकरीबन 21 दिन का लग जाता है. अगर इस दौरान बीमारी आ गई तो फिर वैक्सीन लगाने का फायदा नहीं होगा.
निष्कर्ष
इसलिए समय रहते ही वैक्सीन लगवा लेनी चाहिए. ताकि वैक्सीन पशु के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास कर ले और इससे पशु बीमारी से बच जाएं.












