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Dairy News: एक्सपर्ट ने देश से कुपोषण खत्म करने का ढूंढा रास्ता, दूध को बताया जरूरी

पैनल में हिस्सा लेने वाले मेहमान.

नई दिल्ली. एनडीडीबी फाउंडेशन फॉर न्यूट्रिशन (एनएफएन) द्वारा आयोजित ‘पोषण सुरक्षा और कुपोषण कम करने में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) की भूमिका’ शीर्षक वाले राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में एक्सपर्ट ने कुपोषण से निपटने के लिए किन चीजों की जरूरत है, इस पर चर्चा की. पैनल चर्चा में बताया गया कि नीति, पोषण विज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक डेयरी क्षेत्र के विशेषज्ञों को एक साथ लाया गया है ताकि कुपोषण की चुनौती और उसके समाधान पर विचार-विमर्श किया जा सके और कुपोषण को भारत से खत्म किया जा सके.

पैनल की अध्यक्षता डॉ. सुनील बख्शी, सलाहकार, NDDB ने की. इस दौरान डॉ. सीमा पुरी, पूर्व प्रोफेसर, सदस्य, इंस्टीट्यूट ऑफ होम इकोनॉमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय, डॉ. सिरिमावो नायर, प्रोफेसर, द महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा, श्री विवेक अरोड़ा, सलाहकार, ATNi (एक्सेस टू न्यूट्रिशन इनिशिएटिव), डॉ. कोमल चौहान, प्रोफेसर, NIFTEM तंजावुर और सुश्री एनाबेल मुलेट कैबेरो, इंटरनेशनल डेयरी फेडरेशन शामिल थे.

इन पहलों पर दिया जोर
चर्चा का संदर्भ तय करते हुए, पैनल के अध्यक्ष डॉ. बख्शी ने कहा कि भारत में कुपोषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता बनी हुई है.

इसे निवारक पोषण हस्तक्षेपों, विशेष रूप से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं पर केंद्रित कार्यक्रमों के माध्यम से प्रभावी ढंग से संबोधित किया जा सकता है.

उन्होंने इस चुनौती से निपटने में स्कूल-आधारित पोषण कार्यक्रमों और CSR-समर्थित पहलों के महत्व पर विशेष रूप से प्रकाश डाला.

पैनलिस्टों ने भारत में कुपोषण के तिहरे बोझ -अल्पपोषण, अतिपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी (जैसे एनीमिया और विटामिन ए और डी की कमी) पर गहन चर्चा की.

विशेषज्ञों ने बताया कि पर्याप्त भोजन की उपलब्धता के बावजूद, अपर्याप्त सेवन, आहार में विविधता की कमी और खराब पोषक तत्व संतुलन के कारण कुपोषण बना हुआ है.

इस संदर्भ में, खाद्य फोर्टिफिकेशन को एक प्रभावी, वैज्ञानिक और व्यवहार-अनुकूल समाधान के रूप में पहचाना गया.

दूध, खाद्य तेल, चावल, गेहूं का आटा और नमक जैसे आमतौर पर खाए जाने वाले मुख्य खाद्य पदार्थों की निगरानी, उपभोग व्यवहार में बदलाव की आवश्यकता के बिना बड़े पैमाने पर सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर कर सकता है.

इस दौरान ‘गिफ्टमिल्क’ और ‘शिशु संजीवनी’ जैसे कार्यक्रमों को भी सही दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में पहचाना गया.

इंटरनेशनल डेयरी फेडरेशन द्वारा एक प्रस्तुति में स्कूल दूध कार्यक्रमों के वैश्विक अनुभवों को साझा किया गया, जिसमें दिखाया गया कि ये पहल 100 से अधिक देशों में 210 मिलियन से अधिक बच्चों तक पहुेचती हैं.

वहीं बच्चों के स्वास्थ्य, सीखने के परिणामों, स्कूल में उपस्थिति और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने में योगदान करती हैं.

पैनलिस्ट इस बात पर सहमत हुए कि दूध एक पोषक तत्वों से भरपूर, सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य और पोषण वितरण के लिए आसानी से फोर्टिफाइड किया जा सकने वाला माध्यम है.

चर्चा में CSR, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, सहकारी समितियों, डिजिटल निगरानी, ​​जन जागरूकता और पोषण की दृष्टि से बेहतर भोजन को ‘आकांक्षी’ (उपभोग के लिए आकर्षक) बनाने की आवश्यकता की महत्वपूर्ण भूमिका को भी पहचाना गया.

निष्कर्ष
पैनल ने इस बात पर जोर दिया कि कुपोषण को खत्म करने और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सरल, स्केलेबल, साक्ष्य-आधारित और सहयोगात्मक समाधानों – विशेष रूप से बच्चों के लिए स्कूल दूध कार्यक्रम – को बड़े पैमाने पर अपनाना जरूरी है.

Written by
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