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Fish Farming: बिहार के मछली पालक अब बनेंगे कारोबारी, बिचौलियों का खेल होगा खत्म

The States and UTs have been advised to implement the clusters based approach for development of fisheries and aquaculture. Based on the request received from the Andaman and Nicobar Administration, development of Tuna fisheries cluster in Andaman & Nicobar Islands has been notified under PMMSY.
प्रतीकात्मक तस्वीर।

नई दिल्ली. बिहार के नवादा जिले के मछली पालक अब सिर्फ पालक नहीं, बल्कि कारोबारी बन सकेंगे. यहां के मछली पालक खुद की कंपनी चलाएंगे और अपनी शर्तों पर मछली बेच सकेंगे. असल में जिले में पहली बार फिश फार्मर प्रोड्यूसर ग्रुप यानी एफएफपीजी बनाने की कवायद शुरू हो गई है. इसका मुख्य उद्देश्य मत्स्य पालकों को एकजुट करना और उन्हें बिचौलियों की चंगुल से मुक्त कराना है. समूह बनाने के लिए विभाग ने कवायद भी तेज कर दी है. जल्द ही निदेशालय के निर्देशानुसार जिला मत्स्य कार्यालय में जिलेभर के मछली पालकों की विशेष बैठक बुलायी जाएगी. इसमें कंपनी के गठन और रजिस्ट्रेशन पर चर्चा होगी.

ज्यादा से ज्यादा मछली पालकों को समूह से जोड़ने की रणनीति बनायी जाएगी. जिला मत्स्य पदाधिकारी मनीष कुंदन ने बताया कि इस ग्रुप का रजिस्ट्रेशन कंपनी एक्ट के तहत कराया जाए‌गा. इसमें एक खास शर्त रखी गई है. इस ग्रुप में केवल वही किसान शामिल होंगे, जो निजी तालाबों में मछली पालन करते हैं. प्रखंड स्तर पर गठित मत्स्यजीवी सहयोग समिति के सदस्य यानी मछुआरे इसमें शामिल नहीं होंगे.

इस समूह के क्या हैं फायदे
ग्रुप में कम से कम 200 और अधिकतम एक हजार से अधिक सक्रिय किसानों को जोड़ने का लक्ष्य है.

समूह बनने से मछली उत्पादकों को बड़े फायदे होंगे. जब 200-500 किसान मिलकर एक साथ मछली का दाना, दवा और जाल खरीदेंगे, तो कंपनियों से मोलभाव कर सकेंगे.

डीएफओ मनीष कुंदन ने बताया कि थोक में खरीदारी करने से सामान सस्ता मिलेगा, जिससे मछली पालन की लागत घटेगी.

अकेला किसान मंडियों में मछली नहीं बेच पाता, लेकिन ग्रुप बनने के बाद वे नवादा या फिर किसी अन्य ब्रांड नाम से अपनी मछली सीधे बड़े व्यापारियों, होटलों या दूसरे राज्यों में भेज सकेंगे.

इससे बिचौलियों का कमीशन बचेगा और मुनाफा किसान की जेब में जाएगा. इसके अलावा, बैंक किसी एक किसान को लोन देने में आनाकानी कर सकता है, लेकिन जब रजिस्टर्ड कंपनी यानी ग्रुप लोन मांगती है, तो प्रक्रिया आसान हो जाती है.

सरकार से मिलने वाले अनुदान और इन्फ्रास्ट्रक्चर यानि गाड़ी, आइस प्लांट आदि का फायदा लेना भी आसान हो जाएगा.

जिला मत्स्य पदाधिकारी ने बताया कि अब तक मछली पालक अकेले काम करते थे, जिससे उन्हें दाना दवा खरीदने में अधिक पैसा खर्च करना पड़ता था.

इतना ही नहीं मछली बेचने के लिए बिचौलियों यानी आढ़तियों पर निर्भर रहना पड़ता था. कंपनी बनने के बाद ये किसान एक ब्रांड के रूप में बाजार में उतरेंगे.

निष्कर्ष
खुद मछली का दाम तय करेंगे और उसे ग्राहकों को उपलब्ध कराएंगे. मछली के अन्य प्रोडक्ट बनाकर उसे बाजार में बेच सकेंगे. सरकार की योजनाओं का लाभ लेने में भी सहूलियत होगी.

Written by
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