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Fish: बिहार की मछली का स्वाद पड़ोसी राज्यों और देश की पहली पसंद

जब पूरी जानकारी होगी तो नुकसान का चांसेज कम होगा और इससे मुनाफा ज्यादा होगा. इसलिए अगर आप मछली पालन करना चाहते हैं तो जरूरी है कि मछली को खाना खिलाया जाता है उसकी जानकारी तो कम से कम कर लें.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. बिहार की मछली का स्वाद पड़ोसी राज्यों और देशों के लोगों को खूब भा रहा है. यही कारण है कि यहां से मछलियां नेपाल, भूटान के अलावा बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और दिल्ली-पंजाब तक भेजी जा रही हैं. पिछले वर्ष 39.07 हजार टन मछली इन जगहों पर भेजी गई. हालांकि, अभी भी बिहार में आंध्र प्रदेश से सस्ती मछली आ रही है. राज्य की जिन मछलियों की बाहर मांग है, उनमें रोहू, कतला, मृगल, पंगास, पोठिया, देसी मांगुर, बोआरी, टेंगरा, सिंधी, गरई, कवई, गैंची आदि शामिल हैं. नेपाल में रोहू, कतला, मिरगल, पंगास के अलावा कीचड़ वाली मछलियां देसी मांगुर, सिंधी, कवई, गरई को पसंद किया जा रहा है.

वहीं दिल्ली, पंजाब के लुधियाना और अन्य शहरों में बोआरी, टेंगरा, रोहू, कतला आदि भेजी जा रही हैं. मुजफ्फरपुर और कटिहार के मछली पालक आइस बॉक्स में ले जाकर दिल्ली पंजाब ले जाकर मछली बेच रहे हैं. पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड में सीमावर्ती जिलों के मत्स्य पालक मछलियां बेच रहे हैं.

बढ़ गया मछली उत्पादन
डेयरी, मत्स्य एवं पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अलावा 39.07 हजार टन मछली राज्य से बाहर जा रही है. हाल के वर्षों में राज्य का मछली का उत्पादन बढ़ा है.

राज्य के जलाशयों में मछली पालन शुरू होने, चौर भूमि में मछली पालन को बढ़ावा देने से मछली उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली है.

इसके अलावा बायोफ्लॉक तकनीक से कम जगह में ज्यादा उत्पादन हो रहा है. जीरा उत्पादन भी बिहार में शुरू हो गया है.

इसका भी फायदा हुआ है. गंगा, गंडक जैसी नदियों में भी जीरा हरेक साल जीरा छोड़ा जाता है.

गौरतलब है कि बिहार की 60 प्रतिशत आबादी मछली खाती है. इस हिसाब से मछली बाजार की वार्षिक मांग करीब 8.5 लाख मीट्रिक टन है.

इस वजह से साल 2024-25 में राज्य का मछली उत्पादन 9.59 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया है. एक वर्ष पहले यह 8.73 लाख मीट्रिक टन था.

इस तरह मछली उत्पादन में बिहार आत्मनिर्भर बन गया है. वहीं राज्य में प्रति व्यक्ति मछली की वार्षिक उपलब्धता 12.21 किलो हो गई है.

इससे पहले प्रति व्यक्ति वार्षिक उपलब्धता 9.59 किलो थी. इसी के बाद दूसरे राज्यों में स्थानीय मछली का कारोबार बढ़ा है. मछली उत्पादन में देश का स्थान चौथा है.

मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के बाद भी आंध्रप्रदेश की मछली बिहार आ रही है. इसका कारण आंध्र की मछली का सस्ता होना है.

बिहार से करीब 38 हजार मीट्रिक मछली बाहर से आ रही है. आंध्र की मछली बिहार के शहरों में 100 से 125 रुपये प्रति किलो के आसपास मिल जाती है.

रोहू 250 रुपये प्रति किलो के आसपास मिलती है. इसके अलावा अन्य देसी मछलियां भुना, बचवा, कांटी, गैची, कवई, सिंधी, देसी मांगुर मछलियां महंगी मिलती है.

Written by
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