नई दिल्ली. मछली पालन में तालाब की गहराई, बांध, पानी की व्यवस्था आदि काफी मायने रखती है. इसलिए बेहद ही जरूरी है कि इन बातों पर भी ध्यान दिया जाए. पबिहार सरकार के पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग (Department of Animal and Fisheries Resources, Bihar Government) की मानें तो तालाब का वातावरण, तालाब की गहराई पर निर्भर करता है. गहराई इतनी होनी चाहिए कि सूर्य की रोशनी तल तक पहुंच सके. ज्यादा गहरा तालाब, ऑक्सीजन के अभाव में विषैली गैस उत्पन्न करता है. जहां आस पास से पानी आने की व्यवस्था हो वहां तालाब की गहराई 3-4 फीट रखनी चाहिए.
तालाब की गहराई में इस बात भी ध्यान दें कि जहां तालाब बरसात के पानी पर निर्भर रहता है, वहां तालाब की गहराई 10-11 फीट किया जा सकता है.
तालाब का बांध कैसा हो?
बोध की ऊंचाई मूल भूमि से एक मीटर रखें. तालाब के बांध की ऊंचाई तालाब के पानी से जितनी कम होगी.
पानी का हवा से सम्पर्क उतना ही अच्छा होगा और हवा से पानी में ऑक्सीजन का मिश्रण अच्छा होगा जिससे पानी में ऑक्सीजन की उपलब्धता अच्छी रहेगी.
बांध की ऊपरी सतह की चौड़ाई कम से कम 2 मीटर हो, बांध का ढलान तालाब की तरफ कम हो ताकि चढ़ने उतरने में सुविधा हो.
ताकि मिट्टी कट कर तालाब में भी न जाये, बांध का ढलान तालाब के बाहर की तरफ ज्यादा रख सकते हैं.
तालाब में पानी आने की व्यवस्था कैसी हो?
पानी के प्रवेश पाइप में छेद वाला ढक्कन लगाएं ताकि पानी में ऑक्सीजन की मात्रा भी बटे.
तालाब में आस-पास से पानी आने के लिए एक प्रवेश नाली (मिट्टी, बंस या सीमेट) की व्यवस्था होनी चाहिए. प्रवेश द्वार तालाब के छिछले भाग में बनाना चाहिए.
नाली की गोलाई का व्यास 15 से.मी. से 30 से.मी. हो.
नाली के मुंह पर जाली लगी होनी चाहिए ताकि पानी के साथ कूड़ा-कचड़ा प्रवेश न कर सके एवं तालाब से मछली बाहर न जा सके और न ही बाहर की मछली तालाब में आ सके.
निष्कर्ष
एक्सपर्ट का कहना है कि अगर ये सब काम नहीं किया तो फिर मछली पालन में नुकसान हो सकता है. जबकि ये व्यवस्थाएं कर लीं तो मछली पालन में उत्पादन बढ़ जाएगा और आपको मुनाफा भी मिलेगा.












