Home मछली पालन Fish Farming: मछली पालन में बेहद काम की हैं ये 3 तरकीबें, कम खर्च किए ही बढ़ जाएगी आपकी आमदनी
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Fish Farming: मछली पालन में बेहद काम की हैं ये 3 तरकीबें, कम खर्च किए ही बढ़ जाएगी आपकी आमदनी

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मछलियों की प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. मछली पालन भारत में तेजी से बढ़ता हुआ व्यवसाय है. एक आंकड़े के मुताबिक भारत के 70 फीसदी से ज्यादा लोग मछली का सेवन कर रहे हैं. इसको देखते हुए भविष्य में मछली की मांग और ज्यादा बढ़ना तय है. वहीं सरकार भी मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी आदि की व्यवस्था कर रही है. सरकार मछली पालन व्यवसाय से किसानों को जोड़कर उनकी आय और ज्यादा बढ़ाना चाहती है. इसी वजह से मछली पालन में कई तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा रहा है. ताकि मछली पालन को बढ़ाया जा सके.

मछली पालन में तो वैसे तो कई तकनीक का इस्तेमाल होता है, लेकिन यहां आपको 3 तकनीक के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका इस्तेमाल करके आप मछली उत्पादन को बढ़ा सकते हैं. इसमें मिश्रित मछली पालन, जलचरी और एकीकृत मछली पालन शामिल है. इनके जरिए आप मछली उत्पादन और ज्यादा बढ़ा सकते हैं.

मिश्रित मछली पालनः यह सबसे प्रचलित तकनीक है. जिसमें भारत की तीन और चीनी मूल की तीन मत्स्य प्रजातियों को तालाब में उनकी आदत और रहने की प्रवृत्ति के अनुसार पाला जाता है. जिससे एकल प्रजाति पालन की तुलना में उत्पादन में अधिक ग्रोथ देखी जाती है. इस विधि से एक हेक्टेयर से प्रतिवर्ष 10 से 15 हजार किलोग्राम तक मछली पैदा की जा रही है. उत्तर प्रदेश में औसत प्रति हेक्टेयर उत्पादन 4500 किलोग्राम है. यह मत्स्य पालकों की सबसे पसंदीदा तकनीक है.

जलचरीः जिसे विगत दशकों में देश भर में मत्स्य पालक विकास अभिकरणों ने बढ़ावा दिया और अब भी मत्स्य पालकों द्वारा व्यापक तौर पर अपनायी जा रही है. इस तकनीक में कतला तालाब की ऊपरी सतह, रोहू मुख्यतः मध्य में और मृगल तल पर पलती है और चीनी मूल की मछलियों में सिल्वर कार्प ऊपर और कामन कार्प तल पर रहती है. ग्रास कार्प को बाहर से चरी या घास खाने को दिया जाता है. इसी तरह कुछ अन्य प्रमुख तकनीकें भी व्यवहार में हैं.

एकीकृत मत्स्य पालनः विभिन्न फसलों, मवेशी और मछलियों का एक साथ पालन यहां मुख्य उद्देश्य है. इसमें अवशिष्ट पदार्थों को फेंका नहीं जाता बल्कि उनका पुनर्चक्रण कर उपयोग किया जाता है. अतः यह जीविकोपार्जन एवं आय की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तकनीक है. एकीकृत पालन कई प्रकार से किया जाता है.

कृषि सह जलकृषिः इस तरह के पालन के लिए विभिन्न तरह की फसल उपयुक्त होती है. फल (पपीता, केला, अमरूद, नींबू, सीताफल, अनानास, नारियल), सब्जियां (चुकन्दर, करेला, लौकी, बैंगन, बन्दगोभी, फूलगोभी, खीरा, ककड़ी, खरबूजा, मटर, आलू, मूली, टमाटर), दलहन (हरा चना, काला चना, अरहर, राजमा, मटर) तिलहन (मूंगफली, सरसों, तिल, रेडी) फूल (गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा), औषधीय पौधे (घृतकुमारी, तुलसी, कालमेध, नीम) आदि. तालाब के चारो तरफ 3 फीट चौड़ा ऊंचा बांध बनाकर उस पर बागवानी (पपीता, केला, अमरूद, नारियल इत्यादि) कर सकते हैं. ग्रास कार्प के भोजन के लिये चरी नेपियर घास की खेती भी तालाब के किनारे की जा सकती है. तालाब से प्राप्त गाद एवं जलीय अपतृणों को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है. इस तरह से तालाब के किनारे के खेत को बिना अतिरिक्त पानी खर्च किये उपजाऊ भी बना सकते हैं.

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