नई दिल्ली. ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए भेड़-बकरी जैसे छोटे पशुओं का पालन करना बहुत ही फायदेमंद साबित हुआ है. किसान छोटे पशुओं के पालन में भेड़ का पालन भी करते हैं और इससे ऊन उत्पादन के साथ-साथ दूध और मीट उत्पादन भी किया जाता है. भेड़ पालन कारोबार वर्तमान में कई किसानों की आर्थिक स्थिति को पहले से बेहतर बनाने में मददगार साबित हुआ है. इन्हीं को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर योजनाएं बनाकर किसानों को भेड़ पालन के लिए हर संभव मदद करती हैं. गौरतलब है कि राष्ट्रीय पशु मिशन के तहत कई परियोजनाओं को लागू कर किसानों को भेड़ पालन के लिए तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और तय प्रावधानों के अनुसार सब्सिडी प्रदान की जाती है.
ये है गद्दी नस्ल की भेड़ की पहचान
भेड़ की कई नस्ल होती है. अलग-अलग नस्ल की भेड़ का पालने का अपना अलग.अलग फायदा भी होता है. अगर यहां बात की जाए गद्दी नस्ल की भेड़ की तो इस नस्ल की भेड़ का आकार मध्यम होता है. इस नस्ल की भेड़ के शरीर पर आम तौर पर सफेद रंग के बाल पाए जाते हैं, लेकिन भूरा और भूरा, काला रंगों के मिश्रण में भी इसे देखा गया है. गद्दी नस्ल की भेड़ को भदरवाह के नाम से भी जाना जाता है. इसका मूल स्थान जम्मू कश्मीर की किश्तवाड़ और भदरवाह तहसील है बताया जाता है.
3 बार निकाला जा सकता है ऊन
उनकी पूंछ छोटी और पतली होती है. गद्दी भेड़ के शरीर का औसतन भर 29 किलो से 34 किलोग्राम तक होता है. इसलिए इसका मीट भी बेचकर अच्छी कमाई की जा सकती है. इसके शरीर का औसत लंबाई 64.69 सेंटीमीटर होती है. ऊन अपेक्षाकृत बारीक और घना होता है. इस नस्ल की भीड़ का औसतन उत्पादन 437 से 696 ग्राम तक होता है. गद्दी भेड़ से आमतौर पर साल में तीन बार ऊन निकाला जा सकता है.
ये है इनका मुख्य भोजन
वैसे ज्यादातर भेड़ को चरना पसंद होता है और उन्हें फलीदार चारे पत्ते फूल आदि पसंद है. उन्हें लोबिया, बरसीम, फलिया खाना अच्छा लगता है. गद्दी भेड़ भी इन्हीं चारों को खाना पसंद करती हैं. चारे में ज्यादातर इनके रवां, लोबिया आदि दिया जाता है. जैसे कि ये एक वार्षिक पौधा है. इसलिए इसे मक्की और ज्वार के मिश्रण के साथ मिला कर दिया जाता है. भेड़ आमतौर पर 6 से 7 घंटे तक मैदान में चरती है. इसलिए इन्हें हरी घास और सूखे चारे की जरूरत होती है. चरने के लिए इन्हें ताजा हरी घास की जरूरत होती है.










