नई दिल्ली. इस साल मॉनसून की बारिश पर कुदरती कहर का असर पड़ सकता है. असल में अल नीनो (El Niño) जो प्रशांत महासागर में होने वाली एक मौसमी घटना है, इसका असर दिखाई देने लगा है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की मानें तो अल नीनो की असर सक्रिय हो चुका है. जिसके चलते इस साल मॉनसून के कमजोर होने व भीषण गर्मी पड़ने का खतरा बना हुआ है. एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि इससे जानवर भी बेहद परेशान होंगे और पशुपालकों को भी दिक्कतें होंगी.
कहा जा रहा है कि अल नीनो की वजह चारे की उत्पादकता पर असर पड़ेगा. जिससे पशुपालन में चारे की कमी हो सकती है. खासतौर पर पशुपालन में हरे चारे की बेहद अहमियत होती है. इससे पशुओं को भरपूर न्यूट्रीशियन मिलता है जिससे उन्हें बेहतर उत्पादन करने में मदद मिलती है. ऐसे में अल नीनो के असर के चलते हरे चारे के उत्पादन पर प्रभाव पड़ सकता है. जिसके नतीजे में चारे की कमी होगी और ये महंगा भी होगा.
पशुपालन की बढ़ जाएगी लागत
एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि हरे चारे की कमी के चलते चारा जब महंगा होगा तो पशुपालन की लागत पर इसका असर पड़ेगा.
दूध उत्पादन करने में पशुपालकों को ज्यादा पैसा खर्च करना होगा. इससे दूध की कीमतें भी बढ़ सकती है.
यदि दूध की कीमतें बढ़ती हैं तो इसके चलते इससे आम आदमी पर भी असर पड़ेगा. हालांकि साइलेज से हरे चारे की कमी पूरी की जा सकती है.
जान लें कि साइलेज एक संरक्षित चारा होता है, जिसे जहां हवा न पहुंचे ऐसी जगह रखा जाता है. हरे चारे का फर्मेन्टेशन करके इसे तैयार किया जाता है.
अनाज की चारे वाली फसलें, जो कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती हैं, उनसे अच्छा साइलेज बनता है. सरफेस साइलो में लगभग 5-1000 टन हरे चारे को संरक्षित किया जा सकता है.
साइलेज बनाने के लिए फसल की 30-35 फीसद शुष्क पदार्थ की अवस्था में कटाई की जाती है. फसल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है.
साइलो में कटा हुआ चारा भर देते हैं और हरे चारे को अच्छी तरह हाथों से या मशीन की सहायता से दबाते हैं.
साइलो को पॉलिथीन शीट से अच्छी तरह बन्द कर दिया जाता है. फिर इसे मिट्टी से ढका जाता है.
साइलो को 45 दिन तक इस अवस्था में छोड़ना पड़ता है इसके बाद साइलेज पशुओं को खिलाने लायक हो जाता है.
निष्कर्ष
अगर आप वक्त रहते साइलेज तैयार कर लेते हैं तो फिर इससे हरे चारे की समस्या को खत्म किया जा सकता है.











