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Fish Farming: बिहार में मछली पालन से हो रही है लाखों की कमाई, बहुतों को मिल रहा है रोजगार

तालाब में खाद का अच्छे उपयोग के लिए लगभग एक सप्ताह के पहले 250 से 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर बिना बुझा चूना डालने की सलाह एक्सपर्ट देते हैं.
तालाब में मछली निकालते मछली पालक

नई दिल्ली. बिहार का खगड़िया कभी बाढ़ और गरीबी की मार झेलने वाला जिला था लेकिन आज मछली उत्पादन का हब बन चुका है. यहां की मछलियां खगड़ि‌या लोकल मार्केट, आपसपास के जिले के साथ असम-बंगाल तक जा रही हैं. इसी मछली पालन से आज महिलाएं स्वावलंबी बनकर परिवार को आर्थिक मदद दे रही हैं. मछली पालक बायोफ्लॉक, आरएएस और केज कल्चर जैसी नई विधियां अपनाकर कम जमीन में लाखों कमा रहे हैं. जिला मत्स्य विभाग का दावा है कि इस बार 41 हजार मीट्रिक टन का लक्ष्य आसानी से पूरा हो जाएगा.

जिला मत्स्य पदाधिकारी लालबहादुर साफी ने बताया कि 2024-25 में हमने 38.88 हजार मीट्रिक टन मछली उत्पादन का लक्ष्य रखा था. इस बार 2025-26 के लिए इसे बढ़ाकर 41 हजार मीट्रिक टन कर दिया गया है. दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक करीब 22 हजार मीट्रिक टन उत्पादन हो चुका है. मार्च तक लक्ष्य पूरा होने को पूरी संभावना है.

किस योजना से मिल रहा है फायदा
राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री समिति चौर विकास योजना ने सैकड़ों किसानों की जिंदगी बदल दी. योजना के तहत किसान को 5 बीघा चौरनुमा जमीन चाहिए.

इसमें ढाई बीघा में तालाब खोदकर मछली पालन किया जाता है और बाकी ढाई बीघा में खुद ही मिट्टी डालकर खेती लायक बनाई जाती है.

मत्स्य विभाग सब्सिडी देता है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमवाईएस) के तहत नए तालाब, बायोफ्लॉक यूनिट, आरएएस और केज कल्चर पर 40-60% तक सब्सिडी मिल रही है.

जिले में मत्स्य विभाग ने 180 जलकर मत्स्यपालकों को सौंप रखे हैं. इनका टेंडर विभाग निकालता है और मछुआरे बोली लगाकर लेते हैं.

इन जलकरों से सिर्फ मछुआरे ही नहीं, बल्कि सभी वर्ग के लोग, ट्रांसपोर्ट, आइस फैक्ट्री, बाजार के व्यापारी तक की रोजी-रोटी चलती है. एक जलकर से सालाना 50-60 लाख तक की कमाई हो रही है.

मछली पालन अब सिर्फ पुरुषों का क्षेत्र नहीं रहा। परबत्ता की रंजू देवी, आलौली की मीना देवी और बेलदौर की संगीता कुमारी जैसी दर्जनों महिलाएं बायोफ्लॉक और तालाब पालन कर रही हैं.

Written by
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