Home पशुपालन Sheep: इस खास नस्ल की भेड़ को भारत के कई प्रदेशों में किया जाता है पसंद, पाली तो होगी मोटी कमाई
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Sheep: इस खास नस्ल की भेड़ को भारत के कई प्रदेशों में किया जाता है पसंद, पाली तो होगी मोटी कमाई

गोट एक्सपर्ट का कहना है कि एक से तीन महीने के बीच मेमना पालन की बात की जाए तो पहले महीने में शरीर का वजन सात किलोग्राम होता है.
मुजफ्फरनगरी भेड़ की प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. भेड़ पालन के मामले में हमेशा से ही राजस्थान का नाम सबसे पहले जहन में आता है. दूसरा भेड़ पालन से हमें ऊन मिलती है लेकिन अब सिर्फ ऊन के लिए ही भेड़ को नहीं पाला जाता बल्कि पशुपालक भेड़ पालन से कई तरह के मुनाफे भी ले रहे हैं. भेड़ के दूध के अलावा मीट की भी अच्छी खासी डिमांड होने लगी है, इसलिए अब पशुपालकों का मकसद मीट के लिए भेड़ पालना भी बनता जा रहा है. अब राजस्थान के अलावा यूपी में भी भेड़ पालन को खास तवज्जो दी जा रही है, जिससे पशु पालक हर महीने मोटा मुनाफा कमा रहे हैं.

सबसे ज्यादा डिमांड में रहती है मुजफ्फरनगरी भेड़
उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान यानी सीआईआरजी के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉक्टर गोपाल दास से जब लाइव स्टॉक एनिमन न्यूज ने बात की तो उन्होंने भेड़ पालन को लेकर कई तथ्य बताए, जो कई मायनों में लोगों के लिए नए भी हैं. उन्होंने बताया कि भेड़ की तो कई नस्लें होती हैं लेकिन मुजफ्फरनगरी भेड़ की बात ही कुछ और है. इस भेड़ की डिमांड मांस के लिए बहुत होती है. भेड़ के मीट में चिकनाई यानी (वसा) बहुत होती है. यही वजह है कि ठंडे इलाके जम्मू—कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में मुजफ्फरनगरी भेड़ के मीट को बहुत पसंद किया जाता है. वहीं साउथ के आंध्र प्रदेश में भी चिकने मीट की डिमांड हैं क्योंकि वहां पर बिरयानी का चलन काफी है.

मुजफ्फरनगरी भेड़ की ऊन का नहीं होता प्रयोग
सीआईआरजी के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉक्टर गोपाल दास ने बताया कि
राजस्थान में बड़ी संख्या में भेड़ पाली जाती हैं. मगर, वहां की भेड़ और मुजफ्फरनगरी भेड़ में बड़ा फर्क है. जबकि दूसरी नस्ल की जो भेड़ होती हैं उनकी ऊन बहुत अच्छी होती है. जबकि मुजफ्फरनगरी भेड़ की ऊन रफ होती है. जैसे ऊन के रेशे की मोटाई 30 माइक्रोन होनी चाहिए. जबकि मुजफ्फरनगरी के ऊन के रेशे की मोटाई 40 माइक्रोन है. इस भेड़ की ऊन को गलीचे के लिए भी बहुत अच्छा नहीं माना जाता. मुजफ्फरनगरी भेड़ का रंग एकदम सफेद होता है. लंबी पूंछ होती है. 10 फीसदी भेड़ों की तो पूंछ जमीन तक को छू जाती है. कान लंबे होते हैं. नाक देखने में रोमन होती है. मुजफ्फरनगर के अलावा बिजनौर, मेरठ और उससे लगे इलाकों में खासतौर पर पाई जाती है.

मुजफ्फरनगरी भेड़ में मृत्यु दर कम
सीआईआरजी के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉक्टर गोपाल दास बताते हैं मुजफ्फरनगरी भेड़ हार्ड नस्ल की मानी जाती है. इसीलिए इस नस्ल में मृत्यु दर सिर्फ 2 फीसद ही है. जबकि दूसरी नस्ल की भेड़ों में इससे कहीं ज्याादा है. मुजफ्फरनगरी भेड़ के बच्चे चार किलो तक के होते हैं. जबकि दूसरी नस्ल के बच्चे 3.5 किलो तक के होते हैं. अन्य नस्ल की भेड़ों से हर साल ढाई से तीन किलो ऊन मिलती है. जबकि मुजफ्फरनगरी भेड़ डेढ़ किलो से लेकर 1.4 किलो तक ही ऊन हर साल देती है. छह महीने में मुजफ्फरनगरी भेड़ का वजन 26 किलो हो जाता है. जबकि अन्य नस्ल में 22 या 23 किलो वजन होता है. एक साल की मुजफ्फरनगरी भेड़ का वजन 36 से 37 किलो तक हो जाता है. जबकि अन्य नस्ल की एक साल की भेड़ का सिर्फ 32 से 33 किलो वजन तक ही पहुंच पाती हैं.

भेड़ों से जुड़ी रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी
-देशा में भेड़ों की 44 नस्ल पंजीकृत हैं.
-कुल मीट प्रोडक्शन में भेड़ की हिस्सेदारी 10.04 फीसदी है.
-देश में ऊन का कुल प्रोडक्शन 33.61 मिलियन टन है.
-देश के पांच राज्यों में 85.54 फीसद ऊन प्रोडक्शन होता है.
-2022-23 में देश में भेड़ के मीट का कुल उत्पादन 8.83 लाख टन था.
-भेड़ों को मीट, दूध और ऊन के लिए पाला जाता है.

Written by
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